Friday, November 19, 2021

ससम्मान

 


आतंकवादी बुलाया 

खालिस्तानी कहा

देशद्रोही बनाया 

कंटीले तार 

नुकीले लोहे 

ठंढे बदबूदार पानी 

से लोकतंत्र की आड़ में बजबजाती तानाशाही बचाते 

तुमने मारे कितने यार हमारे 

रास्ता रोका 

गाड़ियों से कुचला 

अपनी ताकत की सनक में 

लेकिन 

हमें याद था 

उस बुड्ढे का सिखाया 

हाँ वो ही बुड्ढा 

जिसका हत्यारा तुम्हारा अभिमान है 

बुड्ढे ने सिखाया था 

हिंसा कमजोर का हथियार है 

हम उसी सीख पर कायम हैं और रहेंगे 

तुम्हारे सितम की इंतेहा तक 

जो कि हमारी रोजमर्रा की जद्दोजहद के आगे फीकी है 

कहते रहेंगे अपनी बात 

यही है तुम्हारी वापसी का फरमान 

बिना तुम्हारे तरीके अपनाए 

भेजेंगे वापस तुम्हें 

ससम्मान 

"कर्ता- ने" "कर्म-को"



सालों पहले पारसाई जी को पढ़ा था, उनकी हर बात सच लगाती है। इतने दंगो को देखने और सम्बंधित रिपोर्टों को पढ़ने के बाद ये मालूम हुआ है की दंगों के मुख्य कारण (हिंदी व्याकरण के हिसाब से, आपने "कर्ता- ने" "कर्म-को" वाला सूत्र तो याद किया ही होगा) लगभग निश्चित हो जाता है। नीचे कारन सूची लिखी है, पिछले साठ - सत्तर साल से ज्यों की त्यों है:

१ सभी धार्मिक स्थल
२ जानवर
३ इंसानी मादा
४ जमीन और जायदाद
५ धर्म
६ धंधा

अगर आप सूची को ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे की सारी चीजें पुरुष के प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए हैं। यह जानवरों में श्रेष्ठतम नर को समूह की सारी मादाओं से सम्भोग और समूह के चरने की सीमा क्षेत्र पर आधिपत्य ज़माने की निशानियों की तरह मात्र है।

जयराम रमेश जी ने पिछले कुछ समय में पाखाने के महत्व पर बहुत प्रकाश (करात नहीं) डाला। तब से इस सोच में डुबता उतराता फिरता हूँ कि पाखाना इन्सान के लिए इतना जरूरी है, फिर भी ऐसा क्यूँ है कि हाजत और पाखाने के मसले पर कभी कोई दंगा ना हुआ। परन्तु, अगर हो जाता तो शायद अखिल विश्व में पहली बार एक नैसर्गिक, स्वतःस्फूर्त विषय "कारण" बनता दंगे का, जिसे इंसान ने नहीं बनाया, (पाखाने की हाजत), जो उसके नियंत्रण के बाहर है।

अगर लोग इस मसले पर दंगों को करने की तैयारी करते तो कैसे बातें करते, एक मनगढ़ंत बानगी देखिये:

सांप्रदायिक व्यक्ति: “सुना है फलाने (धर्म का नाम अपनी रूचि के अनुसार लगा लें) लोग हाजत के समय भांग बूटी छानकर पीते हैं, और सटाक से फ़ारिग हो जाते हैं  

समाजवादी व्यक्ति:  “ इसी वजह से व्यापार को ध्यान में रख कर हमने तो आपके समाज में भांग बूटी के प्रयोग को अधरम से जुडवा दिया था
सेक्युलर व्यक्ति: "धरम के बीच में आ जाने से काला बाजारी हो तो रही है पर कुछ लोग अधार्मिक होते जा रहे हैं, वो खुद से भंग बूटी उगा रहे हैं  .”

Monday, November 15, 2021

वालिद की वफ़ात पर


तुम्हारी क़ब्र पर

मैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आया

मुझे मालूम था

तुम मर नहीं सकते

तुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थी

वो झूटा था

वो तुम कब थे

कोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा था

मिरी आँखें

तुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तक

मैं जो भी देखता हूँ

सोचता हूँ

वो वही है

जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी

कहीं कुछ भी नहीं बदला

तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं

मैं लिखने के लिए

जब भी क़लम काग़ज़ उठाता हूँ

तुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँ

बदन में मेरे जितना भी लहू है

वो तुम्हारी

लग़्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता है

मिरी आवाज़ में छुप कर

तुम्हारा ज़ेहन रहता है

मिरी बीमारियों में तुम

मिरी लाचारियों में तुम

तुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा है

वो झूटा है

तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँ

तुम मुझ में ज़िंदा हो

कभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना

- निदा फ़ाज़ली

Sunday, August 13, 2017

क्यों न चीख़ों की याद करते हैं, मेरी आवाज़ गर नहीं आती - ग़ालिब


बच्चे सो गये हैं
बहुत गहरी नींद में
अब कभी नहीं उठेंगे, ना फिर कभी उनकी शरारतें हमारे दिल को गुदगुदाएँगीं।
एक ऐसी नींद जो हर दो घण्टे पर थोड़ा और दूध पी लेने के लिये टूट जाती, वो नींद अब इस क़दर तारी है कि वो ना किसी मन्दिर के नाफूस की आवाज़ से टूटेगी और ना बी मुक़द्दस मस्जिद की अजान से।

बरसात में माँओं को सबसे ज़्यादा फ़िक्र बारिश से बच्चों के बचाने की होती है।वो माँएं जो अपने बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य ते लिये अपने बच्चों को हस्पताल लेकर आयी थीं - अब सो चुके बच्चों को कभी जगा नहीं पाएंगी। शायद - बढ़िया क़ब्रों तक बारिश का पानी नहीं पहुँच पाएगा।

ये बच्चे वतन की राह पर शहीद नहीं हुए हैं, क्यूँकि शहीद तो देश के लिये क़ुर्बान होते हैं। मुल्क शहीदों की इज़्ज़त अफ़्जाई करता है, उनके एहसान--करम के बोसे लेता है। बेऔलाद हुई माँओं के पास ये तसल्ली भी नहीं कि उनके बच्चे देश के लिये क़ुर्बान हुए।

शायद एक या दो दिन में हंगामाखेज मीटिंग होगी, फिलवक्त तो अगस्त में साल दर साल बेमतलब मर जाने वाले बच्चों के सिर गिने जा रहे हैं। ऐसे समय में सिन्हा जी मूर्ति का अनावरण करते हुए स्वागत की फूल मालाओं से दबकर दुख से मुस्कुराते दिखते हैं, उमा और योगी जी इस बेमिसाल गम की घड़ी में भोग की थाली के गिर्द बैठे प्रचण्ड जनमत विजय जनित मुस्कान के साथ दुखी दिखते हैं। कोई शास्त्री जी जवाबदेही की नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं, पुराना जवाबदेह मरहूम शास्त्री वैसे भी कांग्रेसी था - ६० साल के पतन मार्ग का एक नेता भर।

अब इस मसले पर जाँच होगी, किस बात की जाँच होगी - यह भी जाँच का विषय है। योगी जी, उत्तर प्रदेश सरकार ने कह दिया है कि बीमारियों के चलते बच्चे सो गये। शायद जाँच हो रही है, या होने को है या हो ही जाएगी। शायद एक मीटिंग हो रही हो - जिसके पहले राष्ट्रगान गाया गया होगा, ख़त्म होने तलक वन्दे मातरम भी गाया जाएगा, जो इन बच्चों के गाढ़ी नींद में जाने से रोक लेता। शायद इन बच्चों की आत्मा की शान्ती के लिये दुआ भी माँगी गई होगी।

बच्चे की रूह को शान्ती की क्या ज़रूरत होगी? उनके लिये माँगी गई दुआओं के क्या मानी हैं? कुछ तो बेचैनी होगी उनमें जिसे शान्त होना चाहिये शायद माँ की छाती से एक बार और पेट भर दूध पीने की चाहत रह गई हो, या बचपन के खेल "किसके बेटा हो - माँ के या पापा के" वाले खेल एक से बोसे और तोहफ़े की खातिर दूसरे को नज़रअन्दाज़ किया हो। लेकिन ख़बरों में आया कि ऑक्सिजन ख़त्म हो गई थी, शायद किसी बच्चे ने अपने पूरे फेफड़े पर साँस लेने की चाहत पूरी की हो।

ऐसे समय में जब हम सब श्मशान, क़ब्रिस्तान और प्रखर हिन्दू राष्ट्र बनाने बनाने के खेमों एकजुट अपनी ताक़त बढ़ा रहे हैं, शायद कुछ  क़दम फ़ेसबुक के बाहर रखेंगे। बहुत सा मुहब्बतों, ढेर सारे फूल, जलती मोमबत्तियों और दिलों में दर्द लिये सेल्फी खींचते खिंचाते सबकुछ इन से चुके बच्चों पर वार देंगे। बस कुछ दिनों की बात है, भोपाल से लेकर व्यापम तक, मध्य प्रदेश से लेकर बिहार, झारखण्ड उड़ीसा यूपी और पूरे मुल्क में मौतें होती रही हैं, फिर सब कुछ वैसा ही हो जाएगा, जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था, ये तरीक़ा हज़ारों सालों से हमारी मिल्कियत है। इसमें हमारे प्रिय नेताओं के यशगान, भगवान की इच्छा, खुदा की चाहत और वाहे गुरू की मेहर के अलावा किसी और का कुछ भी नहीं होगा। मौत पर किसका जोर है? सिवाय एक उसके

इन सारे पचड़ों में हम खोज कर लाएँगे कि इस गहरी नींद के पीछे के कारणों में २५० साल की ग़ुलामी (कुछ इसे ५५० साल भी कहेंगे), पुरानी सरकारें, कोई नेहरू, कोई जयचन्द कोई अखिलेश, या फिर कोई बिज़नेस एजेन्सी या फिर सबसे अच्छा चेक एन्कैशमेण्ट में देरी - कारण है। डिजिटल इण्डिया कहाँ बन रहा है पता नहीं।

एक बच्चे को साँस लेने के लिये किस "कारण" की ज़रूरत होगी? हम जल्दी ही भूल जाएंगे कि ये बच्चे हस्पताल ठीक होने आए थे, ठिकाने लगने नहीं। हमारी सारी नेक नियती का शानदार हीरो एक अकेला डा॰ क़ाफ़िल रहेगा। क्यूँ किसी डाक्टर को अपने एटीएम से पैसे निकालकर लोगों से मदद / भीख माँगकर सांसें जुगाड़नी पड़ीं? यह एक ज़बरदस्ती दिया गया निर्वाण / सुपुर्द ख़ाक करने का मन्जर है। इसमें ईश्वर / खुदा का कोई योगदान नहीं है। लेकिन सबकुछ ऊपर वाले का किया धरा मान लेना लाचारी / मजबूरी है, उसकी मर्ज़ी नहीं। 

परन्तु हमें तो जल्दी है, हर बात की जल्दी है - पढ़ाई, नौकरी, तनख़्वाह, सफलता, अच्छे दिन, कैशलेस इकॉनॉमी, राम मन्दिर और वन्दे मातरम गाने की, इसलिये मुद्दों की तह तक जाना, उनके ठीक होने की मांग करने बहुत बड़ी ज़्यादती है। क्योंकि इसमें समय चला जाता है। मातम मनाकर घर लौट जाना बेहद आसान, इकॉनॉमिकल और सरकारी पसन्द के माफ़िक़ है।

मेरा दिल अब भा मानने को तैयार नहीं है कि कोई इन्सान इतना पत्थर दिल हो सकता है कि जब उसे पता हो कि उसकी चेक पर बनी दस्तखत से जानें बच सकती हैं, एक नॉब को घुमाने से सांसें चल सकती हैं - फिर भी वो उन्हें नहीं छुएगा नहीं। क्या हम ऐसे इन्सानों के वुजूद को मानते हैं

इक हवस है - बेहतरी की, बिल्कुल वैसे ही जैसे साल दर साल मशीनों को बेहतर बनाया जाता रहा है। ये मामला रोटी कपड़ा और मकान से बहुत दूर निकल गया है और अटक गया है धर्म पर, अंग्रेज़ों में हमारे बारे में हमसे बेहतर समझ थी। 

मुख्यमन्त्री ने उस हस्पताल का दौरा भी किया था, प्रखर नेतृत्व और भारी जनसमर्थन की जीत में बेहतरी की आशाएँ दूब की तरह बढ़ रही हैं, बेहया की तरह फिर से हरी हो रही हैं। गुज़ारिश है कि आप आवाम को समझाएँ की वो अपनी उम्मीदें कम करें, लेकिन खुदा के वास्ते उम्मीदों को तोड़िये मत, कम भले कर दीजिये। उम्मीदों को उनकी ज़मीन दिखाने का ये तरीक़ा जानलेवा है।

हमने दुनिया को सैटेलाइट, परमाणु ऊर्जा, गोपालन गोरक्षा, बीफ एक्सपोर्ट, सर्जिकल स्ट्राइक, शल्य चिकित्सा और अनेकानेक क्षेत्रों में अपने वुजूद का एहसास डंके की चोट पर करवा दिया है। असंभव दिखने वाले एफ़डीआई, जीएसटी, नोटबन्दी पर सफल कार्यान्वयन किया है - ऐसा मोदी जी का मानना है। क्या हम ईलाज के लिये हस्पताल जाने वाले बच्चों को फेफड़े भर साँस मुहैया कराने के बारे में कुछ कर सकते हैं?

Friday, April 21, 2017

इति न सिद्धम्



तुम्हें सिद्ध करना चाहता था
पाईथागोरस प्रमेय की तरह
लिखना चाहता था
इति सिद्धम् 
पर गणित की तरह "" का मान
कुछ भी मान लेने की सहूलियत से बचना चाहता था
बचना चाहता था
त्रिज्यामिति से

लेकिन हर यात्रा एक वृत्त सी हो गई है
शुरू करके वहीं पहुँच जाता हूँ 
जहाँ शुरू किया था
केन्द्र बस नहीं मिलता इस वृत्त का
नहीं तो टू पाई आर अबतक याद है मुझे

कुछ बीजगणित के दक्ष लोग पूछते हैं
की मायने बताओ अंकों के
तुम कोई अंक तो हो नहीं 
जो स्थानीय मान निकाल लूँ 

सिद्ध करने सोच रहा हूँ 
कुछ ऐसा भी तो हो
जिसका हल निकलना ही
उसका फल हो

Tuesday, January 26, 2016

गणतन्त्र



गणतन्त्र की दहलीज़
चमकते पत्थरों की
जिस पर
भूख की परछाईं भी थर थराती है
रक्त अपना रंग खो देता है

बचपन तिरंगे बेचकर
भविष्य रफ़ू करता है

और मुश्ताक़ अली अंसारी ६ दिसम्बर १९९२ से
मुस्लिम मुहल्ले की गलियों से बचकर निकलते हैं
क्या करें वो
पूरे हिन्दू लगते हैं
भूख
ख़ून
इन्सानियत को थर्रा देने वाली
गणतन्त्र की दहलीज़
बिछ जाती है
धर्म के आगे

नुस्खा



उसकी ज़ुबान एक पंखे से
झूल गई
उसकी आवाज़ को न सुनने वाले
जात ज़रूर समझते हैं
रंग से पहचानते हैं
धर्म के राज्य में
उसे जूतियों में रखते हैं
इन जूतियों में
पुश्तों के बेगार की चमक है
जेठ की धूप
माघ का जाड़ा है
और मकई के भात भर की भूख
त्योहार के कपड़ों भर की लाज
अपने पैरों के निशान मिटाने वाली पवित्रता
और वो सबकुछ भी जिसने
उनका रंग बदल दिया/जात नहीं
उसे इन्सान बनाये रखने के लिये
किफ़ायती, ईश्वरीय दिव्यता से युक्त
वैदिक नुस्खा

रोहित वेमुला: ६७वां गणतन्त्र दिवस


तेरी आवाज़
सूरज की तरह
आसमान का अन्धेरा काट देगी

तेरे गीत
परिन्दों की तरह
क्षितिज के पार तक जाएंगे
बिना किसी रोक के

मौसम बदलेंगे
साज़ मचलेंगे
और वेमुला की कहानी धुनों में सहेजकर
बचा लेंगे
आने वाली पीढ़ियों के लिये
वह विद्रोह की कविता
नया वेद है
इसे 
ख़ून, या 
ग़ुलामी की नहीं
विमर्श की की सिंचाई चाहिये

साज़ों से निकली धुन
तुम्हारे गीतों के साथ
मनुस्मृति दहन करेगी 
दूसरे किसी भी रोहित वेमुला को
महान गणतन्त्र के पंखे से लटकने नहीं देगी

अन्त में




जो बचा रहा
अन्त में
वही श्रेष्ठ है
इसलिये
इतिहास का हर क्रूरतम किरदार
जीतकर अहिंसक हो गया

हिंसा की जीत
गद्दी पर बने रहने के लिये ज़रूरी
अहिंसा के मुखौटे की बीच
रक्त का स्वाद पाने को लालायित
श्रेष्ठ
बच गये

गणतन्त्र 

Wednesday, September 16, 2015

और बस

नींद में चुभती यादें हैं 
तुम्हारे हाथ की उँगलियाँ 
मछलियाँ 
पसीना
धौकनी
और बस

सादे काग़ज़

सादे काग़ज़
सुनाई देते हैं 
पथराये मंज़र चुप चाप हर्फों से दिखाई देते हैं
सलीबें वक़्त की उस वक़्त गूँगी रहती हैं
हवा ज़मीन पकड़ चलती है
ये मेरा सीना कर्ण के रथ का पहिया हुआ जाता है
जब तक लिफ़ाफ़ा
सुर्ख़ गुलाब
और एक निहायती फ़िल्मी अन्दाज़ से अटा रूमाल
वो ले नहीं लेते
और फिर सोचने लगता हूँ
कल क्या लिखूँगा
फिर से वापस
सातवाँ आसमान

Sunday, March 1, 2015

मर्सिया

ठण्ड बहुत है
थोड़े दुख के अलाव जलाएँ 
मर्सिया पढ़ें
थोड़े इन्सान बन जाएँ

Sunday, December 7, 2014

कूड़ा

शुरुआत करामाती हुई:

बहुत पहले कहीं पढ़ा था की पाकिस्तान के एक कवि ने भारत यात्रा करनी चाही । पाकिस्तान में पासपोर्ट फॉर्म भरना था, फॉर्म पर जन्म का स्थान हिंदुस्तान लिख दिया । पासपोर्ट अधिकारी ने कहा की ये फॉर्म गलत भर दिया है आपने, दुरुस्त कीजिये, आपका जन्म स्थान पाकिस्तान है। उन्होंने अर्ज़ किया, जनाब, ये मुल्क तो हमारी पैदाइश के बाद का है, हम तो हिन्दुस्तान में पैदा हुए थे|
राष्ट्रभक्ति का कोई मुगालता नहीं था शुरूआती दौर में शायद । अब देखिये एक नया धंधा शुरू किया दोनों तरफ के हुक्मरानों ने, जब जनता विकास की उम्मीद में सवालों के गोले दागती है, ठीक उसी समय पडोसी मुल्कों से आतंकी हमले, दोनों देशों में होने लगते हैं | सवाल पीछे रह जाते विकास का, बस बचता है राष्ट्रप्रेम का नशा | अफीम से भी ख़तरनाक |
फिर इस कुर्सी बचाने के अभियान वाली नेताई मज़बूरी में जब आम जनता फंसती है, तो उसे बस यूज़ एंड थ्रो टाइप प्रयोग करके, गाहे बगाहे माइलेज लेने के लिए याद किया जाता है, और अगर मर जाए जनता तो? शहीद बना दो| सस्ता सुन्दर टिकाऊ जुगाड़ । है किसी में हिम्मत की राष्ट्रप्रेम, शहादत पर कोई सवाल करे दोनों मुल्कों में?
जब कोई बड़ा घोटाला हुआ तो उसी समय, कभी कारगिल हुआ, तो कभी नचिकेता हुआ, तो कभी सरबजीत हुआ | चुनाव नज़दीक आये तो अजमल क़साब हुआ, अफज़ल गुरु हुआ, सरबजीत हुआ | अब वो मर गया है भाई, आओ उसे शहीद बनाकर, राष्ट्र को नतमस्तक कराकर (हमारी राष्ट्रभक्ति से ofcourse) धीरे से गद्दी पे बैठ लें | इन लोगों का क्या, कब रोटी कपडा और मकान पे सवाल करने लगे हमसे|
बकौल परसाई साहब - नेता का "ता" खो गया है, बचा सिर्फ "ने" है| बनिये ताले का "ता " देंगे नहीं, क्यूंकि उनके पास सिर्फ "ले" बचेगा, तो इन लोगों ने जनता का "ता" ले लिया है, शहीद बनाके, अब बचा सिर्फ जन है| कभी जानवरों के झुण्ड से कोई शिकारी डरा है, जो आज लोगों के झुण्ड से डर जाए।

बस यहीं कूड़ा गया:

Surya Singh: मैंने आपसे कितनी मर्तबा कहा है कि मेरे भी शहीदी की अगर आप बात उठाते। कम से कम दो-तीन शहीदी तो अपना भी बनता है भाई। राजनीति तो चलती रहती है जनता का क्या है घास है, जिधर फ़ेंक दो उठ कड़ी हो जाती है। लेकिन आप कृपया मेरे शहीदी पे मौन न फरमाए। बड़ी नाइंसाफी होगी। 
कहिये तो अपनी मृत्यु प्रमाण पत्र भी जमा करवा दूँ। अस्पताल वाली भी और जिस घाट मुझे दफनाया गया वहां के प्राधिकारी का भी अधोहस्तान्तरित प्रतिलिपि मैं पेश कर सकता हूँ सबूत के बतौर।

Om Abhay Narayan Rai: गलती तो भयानक है हमारी इसमे, कुछ कीजिये की हम सत्ता में आयें तब आपकी शहादत पर फोकस बनाए | 

अभी इस बार की छुट्टी में अलग अलग तबके के लोगों से मिला | आपकी की बात से कुछ बातें याद आयीं | एक कब्र के पास बैठा थोड़ी देर, वहां एक पेड़ था इस वजह से, पडोसी मुसलमान हैं, उन्होंने बताया की ये एक "शहीदी" की कब्र है| मैं थोडा हैरान हुआ, की मुझे क्यूँ नहीं पता, तब उन्होंने राज़ खोल, ये भाई स्कूटर टैक्सी एक्सीडेंट में शहीद हुए थे| वैसे ही हर गाँव में जहाँ हिन्दू हैं, मिटटी के बड़े बड़े चौरे बने हैं, बरम बाबा (ब्रह्म बाबा ) के लिए| कोई अगड़ा आकस्मिक मृत्यु का शिकार हो तो ब्रह्म बन जाता है और मुसलमान शहीद हो जाता है| जहाँ सरकारें फेल हों, वहां पंजाबी शहीद हो जाता है| जहाँ सरकारी व्यवस्था और प्रबंध फेल हो वहां ठाकरे लोगों को राजकीय सम्मान से निपटाया जाता है
रंग लाती है हिना, पत्थर पर घिस जाने के बाद 
शुर्खुरु होता है इंसा ठोकरे खाने के बाद .... (इस लाइन में तबदीली है)
शहीद होता है इंसा कुत्ते की मौत मर जाने के बाद

Surya Singh: तेरी वफ़ा में सनम, न सफ़र के रहे न वतन के रहे।
बिखरी लाश के इतने तुकडे हुए, न कफ़न के रहे न दफ़न के रहे।।

तो ये जो देशभक्ति सनम-हरजाई है वो मेरे पल्ले पड़ हीं नहीं पाती। लेकिन कुछ चीजें तो आपको भी साफ़ साफ़ दिख रहीं होंगी। पिताजी बोलते हैं वह दारु पीके मदहोशी में हदें पार कर गया था, हुक्म्रानें मानती हीं नहीं। ये तो शहीद है भाई। इसने कुछ इंसानों को मारने में, बम बारूद फोड़ने में, प्रकृति को नष्ट करने में किसी न किसी तरह (चाहे मार के चाहे मर के) काम आया। 

जहाँ तक बरम बाबाओं का सवाल है, वे मरे नहीं मारे गए हैं। आपको मालूम ही होगा की मंदिर और बरमों के नाम पर इस देश में करोड़ो-करोड़ एकड़ जमीन पर किसी ख़ास जाती के लोगों ने किस तरह कब्ज़ा कर रखा है जिसका मालगुजारी भी वे नहीं चुकाते। और अधिकतम जमींन किसी-न-किसी की लाश पर हीं खड़ी हैं।
और जहाँ तक मरने का सवाल है. पुरान नहीं पढ़े हैं क्या। मरना एक अनुभव नहीं अनुभूति है। अगर मैं मान रहा हूँ की मैं शहीद हुआ. मेरी मृत्यु प्रमाण पत्र भी अगर जमा करने को तैयार हूँ, गवाह भी मौजूद हैं तो आप अगर यकीं नहीं आता तो जांच आयोग, इन्क्वायरी बैथायिये आप सीधे सत्ता की सौदा कैसे कर सकते हैं। ये तो वोट के बदले नोट वाली बात हो गयी। अरे मैं किसी को भी वोट नहीं दूंगा, आपके खिलाफ कुछ नहीं बोलूँगा, कोई नौकरी नहीं चाहिए मुझे, किसी तरह की कोई सब्सिडी कोई भत्ता भी नहीं मिले मुझे। किसी धरना प्रदर्शन किसी प्रोटेस्ट में कभी कहीं नहीं जाऊंगा, वादा है । और किसे मरना कहेंगे। शहीदी दिला दीजिये मैं एक मर हुआ हीं इंसान हूँ। ये तो मैं नहीं लिख या बोल रहा, ये तो मेरी रूह है जो अपने हक़ के लिये लड़ रहा है।

Om Abhay Narayan Rai: ये मुझे सत्ता में ना आने देने की कवायद पर:

तू है हरजाई तो अपना भी ये तौर सही
तू नहीं और सही, और नहीं, "और" सही |
बाकी रहा राष्ट्रवाद, इसमें मैं कुत्ते और आदमी की नियत में कोई अंतर नहीं देख पाया, सिवाय इसके की कुत्ता एक गली का मालिक होता है| 
रहा आपका मरना, मुसद्दी आज तक घूम रहा है ये बताने को की मैं जिन्दा हूँ| गोंडसे ने गाँधी को इसलिए मiरi की वो उनकी लाश को राजनैतिक गलियारों में घिसटते हुए नहीं देखना चाहते थे| मतलब जे की बड़ा उलट पुलट है, जो जिन्दा है उसे अपने जिन्दा होने का प्रमाण देना है, और जो मर गया है उसे फिर से मार देना है, और इसके बाद शहादत का खेल, राजकीय सम्मान का ताज।।। सूर्या भाई, इंतज़ार करो, एक दिन तुम्हें मरानोंपरांत मारने के बाद शहादत कर रंग लगाऊंगा इस राष्ट्रभक्त जनता के भाल पर
कागज पर मरना भी कोई मरना है सूर्या भाई, वैसे भी चौरा अगड़ों की मौत पर ही बनता है, मेरे हाथ में अगर सत्ता न आई तो यकीन मानिये, आपकी शहादत कोई रंग नहीं ला पाएगी। ये कुछ कुछ हिना जैसा मसला है:

Surya Singh: भूतों और रूहों के लिए भी एक आप्शन होना चाहिए भारत सरकार के चुनाव पत्रों पर। उनको भी वोट देने का अधिकार दिलाना होगा नहीं तो तुम कभी जीत नहीं पाओगे कसम से


Om Abhay Narayan Rai: भाई हमने वोटर लिस्ट चुन ली है, सिर्फ मर हुए लोग हैं उसमें, और उनका नेता मैं, अकेला जो जिन्दा है