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Friday, April 21, 2017

इति न सिद्धम्



तुम्हें सिद्ध करना चाहता था
पाईथागोरस प्रमेय की तरह
लिखना चाहता था
इति सिद्धम् 
पर गणित की तरह "" का मान
कुछ भी मान लेने की सहूलियत से बचना चाहता था
बचना चाहता था
त्रिज्यामिति से

लेकिन हर यात्रा एक वृत्त सी हो गई है
शुरू करके वहीं पहुँच जाता हूँ 
जहाँ शुरू किया था
केन्द्र बस नहीं मिलता इस वृत्त का
नहीं तो टू पाई आर अबतक याद है मुझे

कुछ बीजगणित के दक्ष लोग पूछते हैं
की मायने बताओ अंकों के
तुम कोई अंक तो हो नहीं 
जो स्थानीय मान निकाल लूँ 

सिद्ध करने सोच रहा हूँ 
कुछ ऐसा भी तो हो
जिसका हल निकलना ही
उसका फल हो

Sunday, December 7, 2014

कुछ बाकी है



मेरी खाँसी
और तुम्हारा मुझे याद करना
कब धुएँ के हर कश के साथ
दोहरे होने लगे
जैसे तुम्हारे ख़तों का आना
उँगलियों में उँगलियों का होना
या हाथों में सिमट जाना हाथ
मेरा वजूद पिघल पिघल के
गंगा के पानी सा
सिर्फ हाथ में सिमटा
जो तुम्हारी हथेली के नीचे
पर
सूंस सा पलटता - उफनता
मेरे वजूद को
अब बस खाँसी आने पर
पता चलता है कि
तुम्हारे याद करने में ही
बस कुछ बाकी है