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Sunday, October 17, 2010

तरक्की



जब गुन गुनी धुप आने लगती है हर सुबह -
याद आती है धुएं से भरी गाँव की सरहद
सब कुछ ढका, छुपा सा
परिचित सा अपरिचित
एक दम नए सा वो सब जो था पुराना
मजीरों और झाल के रंग में रंगा
अपने पन से पगा
हुक्के का धुंआ
कौड़े का ताप
देता था दस्तक, एक मौसम त्योहारों का
न बिजली के लट्टू
ना टेप रेकॉर्डर का शोर
ना डी जे की सर्विस
ना टैलेंट शो का जोर
बैलों की घंटियों से झरता संगीत था
पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर का कोई ना ठौर था
हर उम्र के पास अपना एक रंग था
पूर्ण था
उन्मत्त था
जीवन था
तरक्की हमने इतनी कर ली कि
आज
ह़र मोड़ पर
दिखता है
अधूरापन तमाम